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शी-ट्रंप शिखर वार्ता क्यों नहीं रोक पाई ईरान युद्ध? 77 दिन बाद भी समाधान से दूर दुनिया

Posted on May 16, 2026

बीजिंग में मुस्कुराहटें दिखीं, लेकिन ईरान युद्ध पर नहीं बनी सहमति; आखिर क्यों विफल रही शी-ट्रंप वार्ता? दुनिया की दो सबसे शक्तिशाली महाशक्तियां एक ही मेज पर बैठीं, कैमरों के सामने मुस्कुराईं, हाथ मिलाए और वैश्विक स्थिरता की बातें भी कीं। लेकिन जब बात ईरान युद्ध रोकने की आई, तो बीजिंग में हुई ट्रंप-शी जिनपिंग की बहुचर्चित शिखर वार्ता किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगभग 40 घंटे के दौरे पर चीन पहुंचे थे। इस यात्रा को दुनिया ने बेहद अहम माना क्योंकि उस समय मध्य पूर्व में ईरान युद्ध लगातार भड़कता जा रहा था और पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर इसका असर दिखाई देने लगा था।

ट्रंप प्रशासन को उम्मीद थी कि चीन, जो ईरान का बड़ा आर्थिक साझेदार है, तेहरान पर दबाव बनाकर युद्धविराम की दिशा में कोई ठोस भूमिका निभाएगा। लेकिन जब ट्रंप शुक्रवार को बीजिंग से लौटे, तब तक न तो युद्ध समाप्ति का कोई स्पष्ट रोडमैप सामने आया और न ही अमेरिका-चीन के बीच कोई बड़ा समझौता।

77वें दिन में पहुंचा युद्ध, दुनिया की चिंता बढ़ी

ईरान युद्ध अब 77वें दिन में पहुंच चुका है। यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ था, जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सैन्य हमले शुरू किए।

वॉशिंगटन का दावा था कि यह कार्रवाई ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए जरूरी थी। हालांकि ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह परमाणु बम बनाने की कोई योजना नहीं रखता।

हमलों के जवाब में ईरान ने भी आक्रामक प्रतिक्रिया दी। मिसाइल और ड्रोन हमलों ने पूरे मध्य पूर्व को युद्ध क्षेत्र में बदल दिया। इजराइल के अलावा बहरीन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने भी निशाने पर आए।

चीन ने फिर दोहराया अपना पुराना रुख

बीजिंग वार्ता के दौरान चीन ने साफ कर दिया कि वह इस युद्ध का समर्थन नहीं करता। ट्रंप की मौजूदगी में जारी किए गए बयान में चीन ने कहा कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है और मध्य पूर्व में स्थायी शांति केवल बातचीत से ही संभव है।

चीन ने पाकिस्तान की मध्यस्थता में चल रहे युद्धविराम प्रयासों का समर्थन भी किया।

चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा कि जल्द से जल्द व्यापक और स्थायी युद्धविराम जरूरी है। साथ ही चीन ने शी जिनपिंग की उस चार सूत्रीय योजना का भी जिक्र किया, जिसमें शांतिपूर्ण सहअस्तित्व, राजनीतिक समाधान, साझा सुरक्षा और विकास आधारित सहयोग की बात कही गई थी।

यानी चीन ने साफ संकेत दिया कि वह सैन्य समाधान की बजाय कूटनीतिक रास्ते को प्राथमिकता देता है।

ट्रंप चाहते थे चीन का दबाव, लेकिन बीजिंग ने दूरी बनाई

ट्रंप प्रशासन की सबसे बड़ी उम्मीद यही थी कि चीन ईरान पर प्रभाव डालेगा।

दरअसल, चीन ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है और दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्ते बेहद मजबूत हैं। अमेरिका मानता है कि यदि चीन चाहे तो वह तेहरान को बातचीत की मेज पर लाने में अहम भूमिका निभा सकता है।

लेकिन चीन ने बीजिंग वार्ता में ऐसा कोई संकेत नहीं दिया कि वह अमेरिका के दबाव में आकर ईरान के खिलाफ खुलकर खड़ा होगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि चीन मध्य पूर्व में खुद को “संतुलन बनाने वाली ताकत” के रूप में पेश करना चाहता है। इसलिए वह अमेरिका की तरह किसी एक पक्ष के साथ खुलकर नहीं दिखना चाहता।

होर्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा संकट

इस पूरे संघर्ष का सबसे खतरनाक असर दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ा है।

होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल और LNG सप्लाई गुजरती है, अब वैश्विक तनाव का केंद्र बन चुका है।

मार्च की शुरुआत से ईरान ने इस मार्ग पर कड़ी निगरानी शुरू कर दी। कई जहाजों को रोकने, जांचने और विशेष अनुमति लेने की घटनाएं सामने आईं।

अमेरिका ने इसे वैश्विक व्यापार के लिए खतरा बताया, जबकि ईरान ने कहा कि सुरक्षा हालात के कारण यह कदम जरूरी है।

व्हाइट हाउस के बयान में कहा गया कि ट्रंप और शी जिनपिंग इस बात पर सहमत हुए कि होर्मुज जलडमरूमध्य खुला रहना चाहिए ताकि ऊर्जा आपूर्ति बाधित न हो।

लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के दृष्टिकोण में बड़ा अंतर दिखाई दिया।

चीन क्यों चाहता है खुला समुद्री रास्ता?

चीन दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा आयातक देशों में से एक है। उसकी फैक्ट्रियां, उद्योग और अर्थव्यवस्था काफी हद तक खाड़ी देशों के तेल और गैस पर निर्भर हैं।

यदि होर्मुज लंबे समय तक प्रभावित रहता है तो चीन की आर्थिक रफ्तार पर गंभीर असर पड़ सकता है।

इसी वजह से शी जिनपिंग ने कथित तौर पर अमेरिकी तेल खरीदने में भी रुचि दिखाई, ताकि भविष्य में चीन की निर्भरता कुछ हद तक कम हो सके।

लेकिन चीन ने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि वह इस समुद्री रास्ते के “सैन्यीकरण” के खिलाफ है। यानी बीजिंग नहीं चाहता कि अमेरिका इस संकट के बहाने क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी और बढ़ाए।

अमेरिका-चीन की रणनीति में साफ अंतर

बीजिंग वार्ता ने एक बार फिर दिखा दिया कि अमेरिका और चीन मध्य पूर्व को बिल्कुल अलग नजरिए से देखते हैं।

अमेरिका ईरान को क्षेत्रीय अस्थिरता का मुख्य कारण मानता है और सैन्य दबाव के जरिए उसे कमजोर करना चाहता है।

वहीं चीन मानता है कि लगातार युद्ध और प्रतिबंधों ने ही हालात को और खराब किया है। चीन बातचीत, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय संतुलन की बात करता है।

इसी सोच का फर्क बीजिंग शिखर सम्मेलन में साफ दिखाई दिया।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बढ़ता खतरा

युद्ध का असर अब सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहा। तेल की कीमतों में उछाल, सप्लाई चेन में रुकावट और शिपिंग लागत बढ़ने से पूरी दुनिया प्रभावित हो रही है।

चीन ने अपने बयान में स्वीकार किया कि यह संघर्ष वैश्विक आर्थिक विकास, अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था और ऊर्जा स्थिरता पर भारी दबाव डाल रहा है।

यूरोप, एशिया और अफ्रीका के कई देशों में ईंधन महंगा होने लगा है। एयरलाइंस कंपनियां अतिरिक्त खर्च झेल रही हैं और निवेशकों में भी अनिश्चितता बढ़ गई है।

क्या भविष्य में बन सकती है कोई बड़ी डील?

हालांकि बीजिंग वार्ता से कोई बड़ा परिणाम नहीं निकला, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका और चीन दोनों ही यह समझते हैं कि मध्य पूर्व में लगातार अस्थिरता किसी के हित में नहीं है।

इसलिए आने वाले महीनों में पर्दे के पीछे बातचीत जारी रह सकती है।

लेकिन फिलहाल स्थिति यही है कि ट्रंप चीन से जिस निर्णायक समर्थन की उम्मीद लेकर गए थे, वह उन्हें नहीं मिला। वहीं चीन भी अमेरिका की रणनीति का खुलकर हिस्सा बनने से बचता नजर आया।

मुस्कुराहटों के पीछे छिपा अविश्वास

बीजिंग में कैमरों के सामने दोस्ती की तस्वीरें जरूर दिखाई दीं, लेकिन असली तस्वीर कहीं ज्यादा जटिल है।

अमेरिका और चीन आज सिर्फ व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि वैश्विक प्रभाव की लड़ाई लड़ रहे हैं। ताइवान से लेकर AI तकनीक और मध्य पूर्व तक, दोनों देशों के हित कई जगह टकरा रहे हैं।

यही वजह है कि ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात के बावजूद ईरान युद्ध पर कोई बड़ा ब्रेकथ्रू नहीं हो सका।

दुनिया फिलहाल उसी सवाल के साथ आगे बढ़ रही है — क्या यह युद्ध बातचीत से खत्म होगा या आने वाले दिनों में और खतरनाक रूप लेगा?

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