नई दिल्ली। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की रक्षा नीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। बीते 14 महीनों में केंद्र सरकार ने रक्षा क्षेत्र से जुड़े रिकॉर्ड प्रस्तावों को मंजूरी दी है, जिनकी कुल अनुमानित कीमत लगभग 9.80 लाख करोड़ रुपये है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल सीमित सैन्य कार्रवाई के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में संभावित लंबे और बहुस्तरीय युद्धों की तैयारी को ध्यान में रखकर किया जा रहा है।
नई रणनीति का उद्देश्य सेना को आधुनिक हथियारों, पर्याप्त गोला-बारूद, तेज मरम्मत व्यवस्था और मजबूत रसद (लॉजिस्टिक्स) से लैस करना है, ताकि किसी भी लंबे सैन्य संघर्ष के दौरान परिचालन क्षमता प्रभावित न हो।
युद्ध की बदलती प्रकृति ने बदली रणनीति
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के कई हिस्सों में लंबे समय तक चले सैन्य संघर्षों ने रक्षा योजनाओं की दिशा बदल दी है। यूक्रेन-रूस युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों से यह स्पष्ट हुआ है कि आधुनिक युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहते, बल्कि आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक मोर्चों पर भी लंबे समय तक प्रभाव डालते हैं।
इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए भारत अब ऐसी सैन्य क्षमता विकसित करने पर जोर दे रहा है, जिससे आवश्यकता पड़ने पर महीनों तक सैन्य अभियान जारी रखा जा सके।
रिकॉर्ड रक्षा प्रस्तावों को मिली मंजूरी
रक्षा अधिग्रहण परिषद (Defence Acquisition Council) ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद से अब तक 55 प्रमुख रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी दी है। इन प्रस्तावों में आधुनिक हथियार प्रणालियां, उन्नत मिसाइलें, सैन्य प्लेटफॉर्म, संचार प्रणाली, गोला-बारूद और रक्षा उत्पादन से जुड़ी कई परियोजनाएं शामिल हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यह पूरी राशि एक साथ खर्च नहीं होगी। इसे आने वाले वर्षों में अलग-अलग रक्षा सौदों, निर्माण परियोजनाओं और सैन्य आधुनिकीकरण कार्यक्रमों के माध्यम से निवेश किया जाएगा।
स्वदेशी हथियारों की बढ़ी वैश्विक मांग
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय रक्षा तकनीक और स्वदेशी हथियारों के प्रभावी उपयोग के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के रक्षा उत्पादों की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
विशेष रूप से ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम, लॉयटरिंग म्युनिशन और नेत्र निगरानी प्रणाली जैसे रक्षा उपकरणों को कई देशों ने खरीदने में रुचि दिखाई है।
इनमें से कुछ देशों के साथ हजारों करोड़ रुपये के रक्षा समझौते पहले ही हो चुके हैं, जबकि कई अन्य प्रस्ताव अंतिम चरण में हैं।
कई देशों के साथ बड़े रक्षा समझौते
भारत द्वारा विकसित ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली के लिए फिलीपींस सहित कई देशों के साथ महत्वपूर्ण रक्षा समझौते किए जा चुके हैं। वहीं इंडोनेशिया के साथ भी बड़ा रक्षा सौदा अंतिम स्वीकृति की प्रक्रिया में बताया जा रहा है।
इसके अलावा आकाश मिसाइल प्रणाली को लेकर आर्मेनिया के साथ महत्वपूर्ण अनुबंध पहले ही हो चुका है। इससे स्पष्ट है कि भारत अब केवल रक्षा उपकरण आयात करने वाला देश नहीं, बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार में एक महत्वपूर्ण निर्यातक के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है।
रक्षा निर्यात ने बनाया नया रिकॉर्ड
रक्षा मंत्रालय के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 62 प्रतिशत अधिक है।
आज भारत 100 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण, सैन्य प्रणालियां और उनके कलपुर्जे निर्यात कर रहा है। अमेरिका, फ्रांस और आर्मेनिया जैसे देश भारतीय रक्षा उद्योग के प्रमुख साझेदार बन चुके हैं।
सरकार ने वर्ष 2029-30 तक रक्षा निर्यात को 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। तुलना करें तो वर्ष 2016-17 में यह आंकड़ा केवल 1,522 करोड़ रुपये था। यानी एक दशक से भी कम समय में रक्षा निर्यात में कई गुना वृद्धि दर्ज की गई है।
कुछ चुनौतियां अब भी बरकरार
हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने कई क्षेत्रों में तेज प्रगति की है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर अभी भी तेजी लाने की आवश्यकता है।
विशेष रूप से अत्याधुनिक पनडुब्बियों के निर्माण, पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के विकास और उन्नत सैन्य तकनीकों के स्वदेशीकरण को लेकर अभी भी चुनौतियां बनी हुई हैं। इन परियोजनाओं में तेजी आने से भारत की सैन्य क्षमता और मजबूत हो सकती है।
आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग की ओर बढ़ता भारत
सरकार लगातार ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत घरेलू रक्षा उत्पादन को बढ़ावा दे रही है। निजी और सरकारी रक्षा कंपनियों को आधुनिक हथियार प्रणालियों के निर्माण के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे आयात पर निर्भरता कम हो और रक्षा उत्पादन में भारत वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सके।
निष्कर्ष
ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की रक्षा नीति में आया बदलाव केवल सैन्य खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही व्यापक रणनीति का हिस्सा है। आधुनिक हथियारों की खरीद, स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा, रिकॉर्ड रक्षा निर्यात और लंबे सैन्य संघर्षों के लिए तैयारियों से स्पष्ट है कि भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को नई दिशा देने की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में इन योजनाओं का प्रभाव देश की सैन्य क्षमता और वैश्विक रक्षा बाजार में उसकी स्थिति दोनों पर दिखाई देने की उम्मीद है।


