संकट में गिद्धों की दुनिया: मुदुमलाई के पास मिला रेडियो-टैग्ड दुर्लभ गिद्ध : भारत में गिद्धों की संख्या पिछले दो दशकों में तेजी से घटी है। कभी गांवों और जंगलों के आसमान में आसानी से दिखाई देने वाले ये पक्षी अब बेहद दुर्लभ होते जा रहे हैं। ऐसे समय में तमिलनाडु के मुदुमलाई टाइगर रिजर्व के पास एक रेडियो-टैग लगे व्हाइट-रम्प्ड वल्चर यानी सफेद पीठ वाले गिद्ध का मिलना वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए बड़ी घटना माना जा रहा है।
यह गिद्ध बुधवार को मुदुमलाई टाइगर रिजर्व के किनारे बसे कलहट्टी इलाके के पास मानव बस्ती के करीब पाया गया। स्थिति असामान्य लगने पर वन विभाग की टीम ने तुरंत कार्रवाई करते हुए पक्षी को सुरक्षित पकड़ लिया। शुरुआती जांच में पता चला कि यह वही रेडियो-टैग्ड गिद्ध है जिसे कुछ समय पहले संरक्षण कार्यक्रम के तहत जंगल में छोड़ा गया था।
कौन है यह दुर्लभ गिद्ध?
व्हाइट-रम्प्ड वल्चर भारत में पाई जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण गिद्ध प्रजातियों में से एक है। वैज्ञानिक भाषा में इसे Gyps bengalensis कहा जाता है। एक समय यह प्रजाति भारतीय उपमहाद्वीप में लाखों की संख्या में मौजूद थी, लेकिन दवाओं के गलत इस्तेमाल और पर्यावरणीय बदलावों के कारण इसकी आबादी तेजी से घट गई।
आज यह प्रजाति “क्रिटिकली एंडेंजर्ड” यानी अत्यंत संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल है। वन्यजीव संरक्षण संस्थाएं और सरकारें कई वर्षों से इसके संरक्षण के लिए विशेष अभियान चला रही हैं।
मुदुमलाई के पास मिला यह गिद्ध भी ऐसे ही एक संरक्षण कार्यक्रम का हिस्सा था।
महाराष्ट्र से तमिलनाडु तक का सफर
वन अधिकारियों के अनुसार यह गिद्ध मूल रूप से महाराष्ट्र के ताडोबा-अंधेरी टाइगर रिजर्व से जुड़ा हुआ है। इसे कैप्टिव ब्रीडिंग कार्यक्रम के तहत तैयार किया गया था और बाद में जंगल में छोड़ा गया।
रेडियो टैग लगाए जाने का उद्देश्य उसकी गतिविधियों और व्यवहार पर नजर रखना था ताकि वैज्ञानिक यह समझ सकें कि संरक्षण के बाद ये गिद्ध प्राकृतिक वातावरण में किस तरह खुद को ढालते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, यह गिद्ध पहले महाराष्ट्र से निकलकर कर्नाटक के कलबुर्गी इलाके तक पहुंच गया था। वहां इसकी तबीयत खराब होने पर वन विभाग ने इसे रेस्क्यू किया और उपचार के बाद फिर से सुरक्षित वातावरण में छोड़ दिया।
इसके बाद यह पक्षी दक्षिण भारत के विभिन्न जंगलों और इलाकों में घूमता रहा और आखिरकार अब मुदुमलाई टाइगर रिजर्व के आसपास देखा गया।
मानव बस्ती के पास क्यों पहुंचा गिद्ध?
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि किसी गिद्ध का मानव बस्ती के पास आना सामान्य घटना नहीं मानी जाती। आमतौर पर गिद्ध जंगलों और खुले इलाकों में मृत जानवरों के आसपास दिखाई देते हैं।
मुदुमलाई टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर आर. विध्याधर के अनुसार, पिछले कुछ हफ्तों से यह गिद्ध अलग-अलग क्षेत्रों में घूम रहा था लेकिन दूसरी गिद्ध प्रजातियों के साथ शवों पर भोजन करता नहीं देखा गया।
यही वजह है कि विशेषज्ञ इसकी गतिविधियों को लेकर चिंतित हैं। संभव है कि यह पक्षी पूरी तरह प्राकृतिक वातावरण में खुद को ढाल नहीं पा रहा हो या फिर उसे भोजन खोजने में दिक्कत हो रही हो।
रेडियो टैगिंग क्यों जरूरी है?
आज वन्यजीव संरक्षण में रेडियो टैगिंग बेहद महत्वपूर्ण तकनीक बन चुकी है। इसके जरिए वैज्ञानिक किसी पक्षी या जानवर की लोकेशन, मूवमेंट और व्यवहार पर नजर रख सकते हैं।
गिद्धों के मामले में यह तकनीक और भी अहम मानी जाती है क्योंकि उनकी संख्या बहुत तेजी से घटी है। रेडियो टैग की मदद से यह समझने में सहायता मिलती है कि कौन-से इलाके उनके लिए सुरक्षित हैं और किन परिस्थितियों में उन्हें खतरा होता है।
इस तकनीक से यह भी पता चलता है कि छोड़े गए गिद्ध कितनी दूरी तय करते हैं, किन जंगलों में जाते हैं और क्या वे प्राकृतिक रूप से भोजन खोज पा रहे हैं या नहीं।
भारत में गिद्धों पर क्यों आया संकट?
एक समय भारत में करोड़ों गिद्ध मौजूद थे, लेकिन 1990 के दशक के बाद उनकी संख्या अचानक गिरने लगी। बाद में शोध में पता चला कि पशुओं को दी जाने वाली “डाइक्लोफेनाक” नामक दवा गिद्धों के लिए घातक साबित हो रही थी।
जब गिद्ध उन पशुओं के शव खाते थे जिन्हें यह दवा दी गई होती थी, तो उनकी किडनी फेल हो जाती थी और वे मर जाते थे।
इसके अलावा कई अन्य कारण भी गिद्धों के संकट के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं:
- जंगलों का कम होना
- भोजन की कमी
- बिजली के तारों से टकराव
- जहरीले रसायन
- मानव हस्तक्षेप
- प्राकृतिक आवास का नष्ट होना
इसी वजह से भारत सरकार और कई वन्यजीव संस्थाओं ने गिद्ध संरक्षण कार्यक्रम शुरू किए।
मुदुमलाई टाइगर रिजर्व का महत्व
तमिलनाडु का मुदुमलाई टाइगर रिजर्व दक्षिण भारत के सबसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में गिना जाता है। यह नीलगिरि बायोस्फीयर रिजर्व का हिस्सा है और यहां हाथी, बाघ, तेंदुआ, भालू और कई दुर्लभ पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं।
गिद्धों के लिए भी यह इलाका बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यहां पर्याप्त वन क्षेत्र और प्राकृतिक भोजन उपलब्ध होता है।
वन विभाग लंबे समय से इस इलाके में वन्यजीव संरक्षण पर काम कर रहा है। गिद्धों की निगरानी, घोंसलों की पहचान और उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए विशेष टीमें बनाई गई हैं।
वन विभाग अब क्या करेगा?
वन अधिकारियों ने फिलहाल गिद्ध को सुरक्षित निगरानी में रखा है। विशेषज्ञ उसकी स्वास्थ्य जांच कर रहे हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं वह बीमार तो नहीं या उसे भोजन से जुड़ी कोई समस्या तो नहीं है।
डिजिटल ट्रैकिंग डेटा और रेडियो टैग की मदद से उसकी पिछली गतिविधियों का भी अध्ययन किया जा रहा है।
यदि पक्षी पूरी तरह स्वस्थ पाया जाता है तो संभव है कि उसे दोबारा प्राकृतिक वातावरण में छोड़ा जाए। वहीं यदि उसे विशेष देखभाल की जरूरत हुई तो कुछ समय तक उसे संरक्षण केंद्र में रखा जा सकता है।
गिद्ध क्यों हैं प्रकृति के सफाईकर्मी?
गिद्धों को प्रकृति का सबसे बड़ा सफाईकर्मी माना जाता है। वे मृत जानवरों के शव खाकर पर्यावरण को साफ रखने में मदद करते हैं।
यदि गिद्ध न हों तो जंगलों और गांवों में सड़ते शवों से बीमारियां तेजी से फैल सकती हैं। इसलिए पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में इनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।
विशेषज्ञों का कहना है कि गिद्धों की संख्या बढ़ाना केवल वन्यजीव संरक्षण नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है।
संरक्षण की उम्मीद
मुदुमलाई के पास मिले इस रेडियो-टैग्ड गिद्ध की घटना ने एक बार फिर गिद्ध संरक्षण की जरूरत को सामने ला दिया है। हालांकि यह चिंता की बात है कि पक्षी मानव बस्ती तक पहुंच गया, लेकिन राहत की बात यह है कि वन विभाग ने समय रहते उसे सुरक्षित बचा लिया।
यह घटना बताती है कि यदि वैज्ञानिक तकनीक, वन विभाग और संरक्षण कार्यक्रम मिलकर काम करें तो संकटग्रस्त प्रजातियों को बचाया जा सकता है।
आज जरूरत है कि लोग भी वन्यजीवों के प्रति संवेदनशील बनें और प्रकृति संरक्षण में अपनी भूमिका समझें। क्योंकि गिद्ध केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि पर्यावरण संतुलन की बेहद जरूरी कड़ी हैं।


