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नंदीग्राम से रायटर्स बिल्डिंग तक : कहानी शुभेंदु अधिकारी की

Posted on May 15, 2026

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बदलाव की आहट हमेशा नाटकीय रही है। कभी लाल झंडों की सत्ता ने तीन दशक तक बंगाल पर राज किया, फिर ममता बनर्जी ने “परिवर्तन” का नारा देकर उस सत्ता को उखाड़ फेंका। लेकिन अब बंगाल की राजनीति एक और ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। इस बार कहानी के केंद्र में हैं शुभेंदु अधिकारी — वही नेता जिन्होंने कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी के रूप में पहचान बनाई थी, और आज वही उनके सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन चुके हैं।

नंदीग्राम की धरती से निकला यह नेता अब रायटर्स बिल्डिंग और नबन्ना की सत्ता तक पहुंच चुका है। बंगाल की राजनीति में यह बदलाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों के पूरी तरह बदल जाने का संकेत माना जा रहा है।

कांग्रेस से तृणमूल और फिर BJP तक का सफर

शुभेंदु अधिकारी का राजनीतिक सफर अचानक शुरू नहीं हुआ। वे ऐसे परिवार से आते हैं जिसकी राजनीति में गहरी पकड़ रही है। उनके पिता शिशिर अधिकारी लंबे समय तक सांसद रहे और केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे। पूर्वी मेदिनीपुर जिले के कांथी इलाके से निकलकर शुभेंदु ने छात्र राजनीति और स्थानीय निकायों से अपना सफर शुरू किया।

शुरुआत में वे कांग्रेस से जुड़े, लेकिन 1998 में ममता बनर्जी द्वारा तृणमूल कांग्रेस की स्थापना के बाद उन्होंने उनका साथ पकड़ लिया। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही नेता आगे चलकर बंगाल की राजनीति की दिशा बदल देगा।

नंदीग्राम आंदोलन: जहां बना “बागी नेता”

अगर शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक पहचान को एक घटना में समेटना हो, तो वह 2007 का नंदीग्राम आंदोलन था। वाममोर्चा सरकार द्वारा प्रस्तावित केमिकल हब के खिलाफ जब ग्रामीणों का गुस्सा भड़क रहा था, तब शुभेंदु गांव-गांव जाकर लोगों को संगठित कर रहे थे।

नंदीग्राम आंदोलन केवल भूमि अधिग्रहण का विरोध नहीं था, बल्कि यह बंगाल में सत्ता परिवर्तन की शुरुआत बन गया। इसी आंदोलन ने ममता बनर्जी को सत्ता के करीब पहुंचाया और शुभेंदु अधिकारी को बंगाल की राजनीति का मजबूत चेहरा बना दिया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नंदीग्राम ने दो नेताओं को जन्म दिया — एक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दूसरे रणनीतिकार शुभेंदु अधिकारी।

तृणमूल में बढ़ता कद और अंदरूनी टकराव

नंदीग्राम आंदोलन के बाद शुभेंदु का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा। वे विधायक बने, सांसद बने और फिर मंत्री भी बने। तृणमूल कांग्रेस के भीतर उन्हें “नंबर दो” के रूप में देखा जाने लगा।

लेकिन राजनीति में केवल लोकप्रियता काफी नहीं होती, सत्ता के भीतर समीकरण भी बदलते रहते हैं। पार्टी में अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और नए शक्ति केंद्रों के उभरने के बाद शुभेंदु को लगने लगा कि उनकी भूमिका सीमित की जा रही है।

यहीं से तृणमूल और शुभेंदु के रिश्तों में दरार शुरू हुई।

2020: जब बंगाल की राजनीति में आया भूचाल

दिसंबर 2020 बंगाल की राजनीति के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। इसी महीने शुभेंदु अधिकारी ने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया।

उनके इस फैसले ने पूरे बंगाल की राजनीति को हिला दिया। विरोधियों ने इसे अवसरवाद कहा, जबकि समर्थकों ने इसे “राजनीतिक आत्मसम्मान” की लड़ाई बताया।

BJP ने शुभेंदु को केवल एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि बंगाल में अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत के रूप में देखा।

नंदीग्राम चुनाव: विश्वास बनाम विद्रोह

2021 का विधानसभा चुनाव बंगाल के सबसे चर्चित चुनावों में गिना जाता है। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा जिस सीट की हुई, वह थी नंदीग्राम।

एक तरफ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी थीं और दूसरी तरफ उनके पुराने सहयोगी शुभेंदु अधिकारी। यह मुकाबला केवल चुनाव नहीं, बल्कि विश्वास और विद्रोह की लड़ाई बन गया था।

जब नतीजे आए तो बंगाल ने देखा कि शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को नंदीग्राम में हरा दिया। भले ही BJP तब सरकार नहीं बना सकी, लेकिन तीन सीटों से 77 सीटों तक पहुंचना उसके लिए बड़ी सफलता थी।

इस सफलता का सबसे बड़ा चेहरा शुभेंदु अधिकारी को माना गया।

विपक्ष के नेता से सत्ता के केंद्र तक

2021 के बाद शुभेंदु अधिकारी ने विपक्ष के नेता के रूप में बेहद आक्रामक भूमिका निभाई। उन्होंने जंगलमहल, पुरुलिया, बांकुड़ा और मेदिनीपुर जैसे इलाकों में BJP की पकड़ मजबूत की।

उनकी राजनीति केवल भाषणों तक सीमित नहीं रही। वे लगातार जमीनी स्तर पर सक्रिय रहे और बंगाल में BJP के संगठन को मजबूत करते रहे।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और BJP नेतृत्व का भरोसा भी उन पर लगातार बढ़ता गया।

2026: जब बंगाल में बदल गया पूरा खेल

2026 का विधानसभा चुनाव बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक साबित हुआ। पंद्रह वर्षों तक सत्ता में रहने वाली ममता बनर्जी की सरकार हार गई और BJP ने 200 से अधिक सीटें जीतकर इतिहास रच दिया।

शुभेंदु अधिकारी ने इस बार भी ममता बनर्जी को हराया। भवानीपुर और नंदीग्राम दोनों जगह उनकी जीत ने यह साफ कर दिया कि बंगाल की राजनीति अब नए दौर में प्रवेश कर चुकी है।

जब कोलकाता में अमित शाह ने शुभेंदु अधिकारी को BJP विधायक दल का नेता घोषित किया, तब यह केवल एक राजनीतिक घोषणा नहीं बल्कि बंगाल की राजनीति में नए युग की शुरुआत मानी गई।

क्या बदल पाएंगे बंगाल की राजनीति?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि मुख्यमंत्री के रूप में शुभेंदु अधिकारी बंगाल को किस दिशा में ले जाएंगे।

क्या वे बंगाल की सांस्कृतिक पहचान और BJP की वैचारिक राजनीति के बीच संतुलन बना पाएंगे?
क्या वे उस राज्य में राजनीतिक स्थिरता ला पाएंगे जो दशकों से संघर्ष और हिंसक राजनीति के लिए जाना जाता रहा है?
क्या वे विकास और वैचारिक राजनीति दोनों को साथ लेकर चल पाएंगे?

इन सवालों के जवाब आने वाले वर्षों में मिलेंगे।

बंगाल की राजनीति का नया अध्याय

राजनीति का चक्र बेहद दिलचस्प होता है। कभी जो नेता ममता बनर्जी का सबसे भरोसेमंद सेनापति था, वही आज उनकी सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।

नंदीग्राम की गलियों से निकलकर रायटर्स बिल्डिंग तक पहुंचने की शुभेंदु अधिकारी की कहानी केवल एक नेता की सफलता नहीं, बल्कि बंगाल की बदलती राजनीतिक चेतना की कहानी भी है।

बंगाल, जो कभी ममता बनर्जी के नाम से शुरू होकर उन्हीं पर खत्म होता दिखाई देता था, अब एक नए राजनीतिक अध्याय की ओर बढ़ रहा है — और उस अध्याय का सबसे बड़ा नाम है, शुभेंदु अधिकारी।

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