रिश्तों की मिसाल बनी प्रीति चौधरी, 85 साल की सास को टब में बैठाकर कराई पवित्र बृज परिक्रमा : आज के दौर में जहां रिश्तों में दूरियां बढ़ती जा रही हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले से सामने आई एक तस्वीर ने लोगों के दिलों को छू लिया है। यह कहानी सिर्फ एक धार्मिक यात्रा की नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और भारतीय संस्कारों की जीवंत मिसाल बन चुकी है।
कोसी कलां की रहने वाली प्रीति चौधरी इन दिनों पूरे इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। वजह है उनकी वह अनोखी सेवा भावना, जिसमें उन्होंने अपनी 85 वर्षीय सास चंद्रो देवी को टब में बैठाकर पवित्र बृज 84 कोस परिक्रमा कराने का संकल्प लिया।
यह दृश्य जिसने भी देखा, उसकी आंखें नम हो गईं। लोगों ने इसे केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं बल्कि मां-बेटी जैसे रिश्ते की सबसे सुंदर तस्वीर बताया।
क्या है बृज 84 कोस परिक्रमा?
बृज 84 कोस परिक्रमा हिंदू धर्म की सबसे पवित्र धार्मिक यात्राओं में से एक मानी जाती है। यह यात्रा भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़े स्थानों की परिक्रमा होती है।
करीब 252 किलोमीटर लंबी इस यात्रा में श्रद्धालु मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, नंदगांव और गोकुल जैसे पवित्र स्थलों के दर्शन करते हैं।
इस परिक्रमा को पूरा करना आसान नहीं होता। कई दिनों तक पैदल चलना पड़ता है। गर्मी, थकान और कठिन रास्तों के बावजूद भक्त अपनी श्रद्धा के कारण इसे पूरा करते हैं।
सास की इच्छा बनी बहू का संकल्प
85 वर्षीय चंद्रो देवी लंबे समय से बृज परिक्रमा करने की इच्छा रखती थीं। लेकिन बढ़ती उम्र और कमजोर शरीर के कारण उनके लिए चल पाना संभव नहीं था।
अक्सर बुजुर्ग अपनी इच्छाओं को मन में दबाकर रह जाते हैं, लेकिन प्रीति चौधरी ने ऐसा नहीं होने दिया। उन्होंने तय किया कि चाहे जितनी मेहनत करनी पड़े, वह अपनी सास की यह आखिरी बड़ी इच्छा जरूर पूरी करेंगी।
इसी सोच के साथ उन्होंने अपनी सास को एक मजबूत टब में बैठाकर पूरी यात्रा कराने का निर्णय लिया।
यह फैसला सुनकर शुरुआत में कई लोग हैरान रह गए, लेकिन जब उन्होंने प्रीति की लगन और सेवा देखी तो हर कोई उनकी तारीफ करने लगा।
सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं
भारतीय संस्कृति में हमेशा से बड़ों की सेवा को सबसे बड़ा धर्म माना गया है। लेकिन आधुनिक जीवन की भागदौड़ में कई बार लोग अपने ही बुजुर्गों से दूरी बना लेते हैं।
ऐसे समय में प्रीति चौधरी का यह कदम समाज को एक बड़ा संदेश देता है। उन्होंने साबित कर दिया कि रिश्ते केवल शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार और त्याग से मजबूत होते हैं।
कई किलोमीटर लंबी इस कठिन यात्रा में उन्होंने न केवल अपनी सास का ख्याल रखा, बल्कि हर पल उनकी सुविधा और सम्मान का भी ध्यान रखा।
लोगों ने कहा — ऐसी बहू हर घर में हो
जैसे-जैसे यह खबर और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं, लोग भावुक हो उठे।
कई लोगों ने लिखा कि आज के समय में जहां परिवार टूट रहे हैं, वहां प्रीति चौधरी जैसी बहू समाज के लिए प्रेरणा हैं।
कुछ लोगों ने उन्हें “कलयुग की श्रवण कुमार” तक कह दिया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रीति अपनी सास को हमेशा मां की तरह सम्मान देती हैं। यही वजह है कि दोनों के बीच बेहद गहरा अपनापन दिखाई देता है।
रिश्तों की मिठास का जीवंत उदाहरण
सास-बहू के रिश्ते को अक्सर टीवी सीरियल्स और समाज में विवादों से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन प्रीति और चंद्रो देवी की कहानी इस सोच को बदलने वाली है।
यह रिश्ता दिखाता है कि यदि परिवार में प्रेम, धैर्य और सम्मान हो तो हर रिश्ता खूबसूरत बन सकता है।
प्रीति ने कभी अपनी सास को बोझ नहीं माना। उन्होंने उनकी इच्छाओं को अपना कर्तव्य समझा। यही भारतीय परिवार व्यवस्था की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
धार्मिक आस्था और भावनात्मक जुड़ाव
बृज परिक्रमा केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि भावनाओं और श्रद्धा का संगम मानी जाती है।
चंद्रो देवी के चेहरे पर उस समय जो संतोष और खुशी दिखाई दी, वह शायद किसी शब्द में बयां नहीं की जा सकती।
एक मां के लिए इससे बड़ा सुख क्या हो सकता है कि उसकी बहू उसकी अधूरी इच्छा को अपना सपना बना ले।
समाज के लिए बड़ा संदेश
आज बुजुर्गों की उपेक्षा और अकेलेपन की खबरें अक्सर सामने आती हैं। कई माता-पिता वृद्धाश्रमों में रहने को मजबूर हैं।
ऐसे समय में प्रीति चौधरी की यह कहानी समाज को आईना दिखाती है।
यह संदेश देती है कि अगर परिवार में संस्कार जिंदा हों तो बुजुर्गों का जीवन सम्मान और प्रेम से भरा हो सकता है।
भारतीय संस्कृति की असली पहचान
भारत की पहचान केवल त्योहारों और परंपराओं से नहीं, बल्कि रिश्तों की मजबूती से भी होती है।
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि सेवा, त्याग और बड़ों का सम्मान आज भी भारतीय समाज की आत्मा हैं।
प्रीति चौधरी ने साबित कर दिया कि आधुनिकता के इस दौर में भी संस्कार जिंदा हैं और रिश्तों की गर्माहट अभी खत्म नहीं हुई है।
निष्कर्ष
85 वर्षीय सास को टब में बैठाकर बृज 84 कोस परिक्रमा कराना केवल एक धार्मिक कार्य नहीं, बल्कि मानवता, प्रेम और सेवा का अद्भुत उदाहरण है।
प्रीति चौधरी ने यह दिखा दिया कि अगर मन में सच्चा सम्मान और अपनापन हो, तो कोई भी कठिनाई बड़ी नहीं होती।
उनकी यह कहानी आने वाली पीढ़ियों को रिश्तों का असली महत्व समझाने वाली प्रेरणा बन चुकी है।
आज हर कोई यही कह रहा है —
“ऐसी बहू हर घर में हो।”


