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घरों के अंदर बढ़ती गर्मी का खतरा | भारत की हीटवेव नीति पर बड़ा सवाल

Posted on May 26, 2026

भारत में गर्मी अब सिर्फ मौसम नहीं रह गई है, बल्कि यह धीरे-धीरे एक गंभीर सार्वजनिक संकट का रूप लेती जा रही है। हर साल तापमान नए रिकॉर्ड तोड़ रहा है, शहरों की सड़कें तप रही हैं और मौसम विभाग लगातार हीटवेव की चेतावनियां जारी कर रहा है। लेकिन इस पूरी व्यवस्था में एक ऐसा पहलू है जिसे लगभग नजरअंदाज कर दिया गया है — घरों के भीतर जमा होती खतरनाक गर्मी।

सरकारी हीटवेव अलर्ट आज भी खुले वातावरण में दर्ज तापमान के आधार पर जारी किए जाते हैं। मौसम विभाग के सेंसर सड़कों, मैदानों और खुले इलाकों की गर्मी मापते हैं, लेकिन करोड़ों लोग जिन कंक्रीट के घरों में दिन-रात रह रहे हैं, वहां का तापमान किसी सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा ही नहीं बनता। यही सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है।

हाल ही में दिल्ली की शोध संस्था “क्लाइमेट ट्रेंड्स” द्वारा जारी एक अध्ययन ने इस छिपे हुए संकट को उजागर किया है। चेन्नई के 50 घरों में लगाए गए सेंसरों से जो आंकड़े सामने आए, उन्होंने यह साफ कर दिया कि भारत की असली गर्मी बाहर नहीं, बल्कि घरों की चारदीवारी के भीतर कैद हो चुकी है।

रात में और ज्यादा खतरनाक हो रही गर्मी

आमतौर पर लोग मानते हैं कि दोपहर का समय सबसे ज्यादा गर्म होता है, लेकिन इस स्टडी ने एक अलग ही तस्वीर पेश की। शोध के अनुसार, कई घरों में रात 8 से 9 बजे के बीच तापमान सबसे अधिक पाया गया। कई मकानों में यह 34 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया।

इसकी सबसे बड़ी वजह आधुनिक शहरों की कंक्रीट संरचना है। सीमेंट और RCC से बनी छतें और दीवारें दिनभर सूरज की गर्मी को सोखती रहती हैं और रातभर धीरे-धीरे उसे छोड़ती रहती हैं। इसका असर यह होता है कि बाहर तापमान कम होने के बावजूद घरों के अंदर गर्मी बनी रहती है।

रात के समय नमी भी 75 प्रतिशत से ज्यादा रिकॉर्ड की गई। अधिक नमी के कारण शरीर पसीने के जरिए खुद को ठंडा नहीं कर पाता। यही वजह है कि लोगों को बेचैनी, थकान, सिरदर्द, अनिद्रा और लगातार हीट स्ट्रेस जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

गरीब और मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित

इस संकट का सबसे ज्यादा असर उन परिवारों पर पड़ रहा है जो छोटे फ्लैटों, घनी आबादी वाले इलाकों और कम हवादार मकानों में रहने को मजबूर हैं। स्टडी में शामिल कई घरों में सालभर में 5,000 घंटे से ज्यादा समय तक तापमान 32 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया गया। कुछ घरों में यह अवधि 5,800 घंटे तक पहुंच गई, यानी लगभग आठ महीने तक लगातार गर्मी का दबाव।

अमीर और गरीब दोनों घरों में यह समस्या दिखाई दी, लेकिन फर्क सुविधा का था। जहां संपन्न परिवार एयर कंडीशनर का इस्तेमाल कर पा रहे थे, वहीं गरीब और मध्यम वर्ग केवल पंखों के सहारे गर्मी झेल रहे थे।

हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि सिर्फ AC लगाना स्थायी समाधान नहीं है। कंक्रीट की इमारतें लगातार गर्मी जमा करती रहती हैं। जैसे ही एयर कंडीशनर बंद होता है, कमरा फिर से तपने लगता है। इसके अलावा AC का बढ़ता उपयोग बिजली खपत और कार्बन उत्सर्जन को भी बढ़ाता है।

हीटवेव प्लान में सबसे बड़ी कमी

भारत में इस समय 300 से अधिक हीट एक्शन प्लान लागू हैं और कई नए प्लान तैयार किए जा रहे हैं। लेकिन इन योजनाओं की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इनमें “इनडोर हीट” यानी घरों के अंदर की गर्मी को लेकर कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है।

सरकारी योजनाएं अब भी सिर्फ बाहर के तापमान, लू और धूप से बचाव तक सीमित हैं। जबकि वास्तविक खतरा उन लाखों लोगों को है जो रातभर गर्म दीवारों और बंद कमरों के बीच रहने को मजबूर हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में अगर इनडोर तापमान को हीटवेव नीति का हिस्सा नहीं बनाया गया, तो भारत के शहर रहने लायक नहीं रह जाएंगे।

कूल रूफ और हरियाली ही बन सकते हैं समाधान

स्टडी में कई अहम सुझाव दिए गए हैं जो इस संकट को कम कर सकते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है “कूल रूफ टेक्नोलॉजी”। इसके तहत छतों पर ऐसी कोटिंग या पेंट लगाया जाता है जो सूरज की गर्मी को वापस परावर्तित कर देता है। इससे घरों के अंदर तापमान कई डिग्री तक कम हो सकता है।

इसके अलावा भवन निर्माण में ऐसे मटेरियल इस्तेमाल करने की जरूरत बताई गई है जो कम गर्मी सोखते हों। घरों में बेहतर वेंटिलेशन, खुली खिड़कियां और प्राकृतिक हवा के रास्ते बनाना भी बेहद जरूरी बताया गया है।

एक अन्य वैश्विक अध्ययन, जो हाल ही में “नेचर कम्युनिकेशंस” में प्रकाशित हुआ, उसमें दुनिया के 9,000 शहरों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि शहरों में पेड़ों की संख्या बढ़ाने से “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव को लगभग 50 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।

लेकिन भारत के अधिकतर घनी आबादी वाले इलाकों में हरियाली लगातार घट रही है। कंक्रीट के जंगल बढ़ रहे हैं और पेड़ खत्म होते जा रहे हैं। इसका सीधा असर तापमान पर दिखाई दे रहा है।

बदलनी होगी शहरों की सोच

भारत की गर्मी अब सिर्फ मौसम विभाग की चेतावनी का विषय नहीं रह गई है। यह शहरी विकास, गरीबों की जीवन गुणवत्ता और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुकी है।

जरूरत इस बात की है कि शहरों की योजना बनाते समय सिर्फ ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों पर नहीं, बल्कि रहने योग्य तापमान पर भी ध्यान दिया जाए। अगर घरों के भीतर की गर्मी को नजरअंदाज किया गया, तो आने वाले समय में हीटवेव का सबसे बड़ा खतरा घरों के अंदर ही पैदा होगा।

भारत को अब ऐसी हीट नीति की जरूरत है जो सिर्फ धूप नहीं, बल्कि रातभर तपते घरों की सच्चाई को भी समझे।

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