नई दिल्ली / हरियाणा | पर्यावरण विशेष रिपोर्ट
भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला अरावली पहाड़ियाँ एक बार फिर चर्चा में हैं। खनन, अतिक्रमण और अनियंत्रित विकास परियोजनाओं के कारण अरावली का बड़ा हिस्सा लगातार नष्ट होता जा रहा है। इसी को लेकर दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और राजस्थान के कई इलाकों में जन-आंदोलन और विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते अरावली को नहीं बचाया गया, तो इसका सीधा असर पर्यावरण, जल स्तर और मानव जीवन पर पड़ेगा।
अरावली पहाड़ियाँ क्यों हैं इतनी महत्वपूर्ण?
अरावली पर्वत श्रृंखला लगभग 800 किलोमीटर तक फैली हुई है और यह भारत की सबसे पुरानी पहाड़ियों में से एक मानी जाती है। इसकी उपयोगिता केवल प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है।
🔹 1. दिल्ली-एनसीआर के लिए प्राकृतिक ढाल
अरावली पहाड़ियाँ राजस्थान के रेगिस्तान से आने वाली गर्म हवाओं को रोकती हैं, जिससे दिल्ली-एनसीआर का मौसम संतुलित रहता है।
🔹 2. जल संरक्षण में अहम भूमिका
अरावली की चट्टानें बारिश के पानी को जमीन में रोकती हैं, जिससे भूजल स्तर बना रहता है।
🔹 3. जैव विविधता का केंद्र
यह क्षेत्र कई दुर्लभ वनस्पतियों, पक्षियों और वन्य जीवों का घर है।
विरोध प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं?
पिछले कुछ वर्षों में अरावली क्षेत्र में:
- अवैध खनन
- जंगलों की कटाई
- रियल एस्टेट और सड़क परियोजनाएं
तेजी से बढ़ी हैं।
स्थानीय लोग और पर्यावरण संगठन मानते हैं कि सरकारी नियमों को दरकिनार कर व्यावसायिक लाभ के लिए अरावली को नुकसान पहुँचाया जा रहा है। इसी के खिलाफ आम नागरिक, छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद सड़कों पर उतर आए हैं।
अगर अरावली नष्ट हुई तो क्या होगा?
पर्यावरण विशेषज्ञों की चेतावनी बेहद गंभीर है:
❌ दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण और बढ़ेगा
❌ गर्मी और लू का असर ज्यादा होगा
❌ जल संकट गहराएगा
❌ बाढ़ और सूखे जैसी समस्याएं बढ़ेंगी
इन खतरों को देखते हुए अरावली को बचाना अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का सवाल बन गया है।
आम नागरिक क्या कर सकता है?
विरोध प्रदर्शन के अलावा भी नागरिकों के पास कई विकल्प हैं:
✔️ अवैध खनन की शिकायत प्रशासन से करें
✔️ सोशल मीडिया पर जागरूकता फैलाएं
✔️ पर्यावरण याचिकाओं का समर्थन करें
✔️ वृक्षारोपण अभियानों में भाग लें
✔️ जिम्मेदार विकास की मांग करें
सरकार और न्यायपालिका की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी (NGT) पहले भी अरावली संरक्षण को लेकर कई आदेश दे चुके हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर सख्ती की जरूरत अब भी बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्थायी समाधान तभी संभव है जब नीति, प्रशासन और जनता एक साथ काम करें।
निष्कर्ष
अरावली पहाड़ियाँ केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि भारत की पर्यावरणीय रीढ़ हैं। इन्हें बचाना आने वाली पीढ़ियों के लिए जरूरी है। अगर आज कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में इसकी कीमत हर नागरिक को चुकानी पड़ेगी।

